बुद्धि का अर्थ, परिभाषा, बुद्धि के प्रकार और बुद्धि के सिद्धांत

बुद्धि, शब्द मनोविज्ञान की दुनिया में ही नहीं बल्कि एक व्यक्ति और समाज के लिए भी अहम भूमिका निभाता है।

व्यक्ति के कार्य करने करने की कुशलता, सटीकता जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में बुद्धि का बहुत बड़ा योगदान रहता है।

इस पोस्ट में हम बुद्धि का अर्थ क्या है? बुद्धि की परिभाषा। बुद्धि के प्रकार और बुद्धि के सिद्धांतों के बारे में विस्तार से जानेंगे।

बुद्धि का अर्थ

बुद्धि एक ऐसा शब्द है, जिसका प्रयोग हम अपने आम जीवन की दिनचर्या में करते हैं। लेकिन जितना हम अपने जीवन में बुद्धि के अर्थ को समझते हैं, बाल विकास, शिक्षाशास्त्र और मनोवैज्ञानिक में इसका अर्थ और महत्व कहीं ज्यादा है।

बुद्धि अंग्रेजी शब्द Intelligence का हिन्दी वर्जन है। Intelligence लैटिन भाषा का शब्द है जो कि लैटिन भाषा के दो शब्दों Inter एवं Legere से मिलकर बना है।बुद्धि के अर्थ के बारे में मनोवैज्ञानिकों के बीच मतभेद है, जिससे बुद्धि के किसी एक अर्थ में सहमति नहीं है।

बुद्धि का सरल शब्दों में अर्थ है कि– किसी कार्य, स्थिति में उपलब्ध सभी विकल्पों में से सबसे ज्यादा बेहतर और अनुकूलित विकल्प का चुनाव करके अपने लक्ष्य को हासिल करना।

बुद्धि की परिभाषाएँ

बुद्धि के अर्थ की तरह ही बुद्धि की परिभाषा में अनेक मनोवैज्ञानिकों ने अपने-अपने मत दिए हैं। कुछ मनोवैज्ञानिकों ने बुद्धि की परिभाषा को वातावरण के साथ समायोजन करने की क्षमता के आधार पर परिभाषित किया गया है।

वहीं बहुत से मनोवैज्ञानिकों ने बुद्धि की परिभाषा को पर्यावरण के साथ समायोजन से न जोड़कर, बुद्धि को सीखने की क्षमता के रूप में और कुछ विद्वानों ने अमूर्त चिन्तन (मन में सोचना) करने की क्षमता के रूप में बुद्धि को परिभाषित किया है।

लेकिन बहुत से मनोवैज्ञानिकों ने बुद्धि की परिभाषा को केवल एक चीज से न जोड़ने के बजाय संयुक्त रूप से जोड़कर परिभाषित किया है उनमें से कुछ महत्वपूर्ण बुद्धि की परिभाषाओं को नीचे दिया गया है–

वेश्लर के अनुसार बुद्धि की परिभाषा

बुद्धि एक समुच्चय या सार्वजनिक क्षमता है, जिसके सहारे व्यक्ति उद्देश्यपूर्ण क्रिया करता है, विवेकशील चिन्तन करता है और वातावरण के साथ प्रभावकारी ढंग से समायोजन करता है


– वेश्लर

रॉबिन्सन के अनुसार बुद्धि की परिभाषा

बुद्धि से तात्पर्य संज्ञानात्मक व्यवहारों के सम्पूर्ण वर्ग से होता है, जो व्यक्ति में सूझ-बूझ द्वारा समस्या का समाधान करने की क्षमता, नयी परिस्थितियों के साथ समायोजन करने की क्षमता, अमूर्त रूप से सोचने की क्षमता और अनुभवों से लाभ उठाने की क्षमता को दिखलाता है।


– रॉबिन्सन

स्टोडार्ड के अनुसार बुद्धि की परिभाषा

बुद्धि उन क्रियाओं को समझने की क्षमता है, जिनकी विशेषताएँ कठिनता, जटिलता, अमूर्तता, मितव्ययिता, किसी लक्ष्य के प्रति अनुकूलनशीलता, सामाजिक मान और मौलिकता की उत्पत्ति होती है, और कुछ परिस्थिति में ऐसी क्रियाओं को, जो शक्ति की एकाग्रता तथा सांवेगिक कारकों के प्रति प्रतिरोध दिखलाती हैं, करने की प्रेरणा देती है।


– स्टोडार्ड

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह समझा जा सकता है की बुद्धि वह सामान्य योग्यता तथा विभिन्न मानसिक योग्यताओं का समन्वय है, जो व्यक्ति के व्यावहारिक जीवन में सफल होने में सहायक सिद्ध होती है।

बुद्धि की विशेषताएँ एवं तथ्य

यहाँ पर बुद्धि की प्रमुख विशेषताओं के बारे में बताया गया है, जो कि निम्नलिखित हैं–

• बुद्धि मनुष्य की कई विशेषताओं और क्षमताओं को दर्शाता है।

• बुद्धि के सहारे ही व्यक्ति किसी समस्या के समाधान तक पहुँचता या पहुँचने का प्रयास करता है।

• बुद्धि व्यक्ति को वातावरण के समायोजन करने में मदद करती है।

• बुद्धि के सहारे ही व्यक्ति अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए उसके अनुरूप कार्य करता है, और निर्णय लेता है।

• बुद्धि से व्यक्ति को विवेकशील चिन्तन तथा अर्मूत चिन्तन करने में भी मदद मिलती है।

• बुद्धि व्यक्ति को विभिन्न प्रकार की बातों को सीखने में सहायता प्रदान करती है।

• मनुष्य की बुद्धि पर उसके आस-पास के वातावरण का अनुकूल और प्रतिकूल दोनों प्रभाव पड़ता है।

बुद्धि पर वातावरण का भी प्रभाव पड़ता है । विभिन्न शोधों के निष्कर्षों से पता चलता है कि अच्छे वातावरण में पोषित बच्चों की बुद्धि लब्धि अधिक होती है।

बुद्धि के प्रकार

थॉर्नडाइक एवं गैरेट ने बुद्धि को तीन प्रकार में बाँटा है जो कि निम्नलिखित हैं–

1. अमूर्त बुद्धि

अमूर्त बुद्धि व्यक्ति की ऐसी बौद्धिक योग्यता जिसकी मदद से गणित, शाब्दिक, या सांकेतिक समस्याओं का समाधान किया जाता है।

अमूर्त बुद्धि का प्रयोग करके हम पढ़ने, लिखने एवं तार्किक प्रश्नों में करते हैं। कवि, साहित्यकार, चित्रकार आदि लोग अमूर्त बुद्धि से ही अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।

2. मूर्त या स्थूल बुद्धि

मूर्त या स्थूल बुद्धि के द्वारा व्यक्ति विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का व्यावहारिक एवं उत्तम प्रयोग करने की क्षमता अर्जित करता है।

मूर्त बुद्धि को व्यावहारिक यान्त्रिक बुद्धि भी कहा जाता है। हम अपने दैनिक जीवन के ज्यादातर कार्य मूर्त बुद्धि की ही सहायता से करते हैं।

3. सामाजिक बुद्धि

सामाजिक बुद्धि से तात्पर्य उन बौद्धिक योग्यताओं से जिसका उपयोग कर व्यक्ति सामाजिक परिवेश के साथ समायोजन स्थापित करने में करता है।

बुद्धि के सिद्धान्त

आज के समय में बुद्धि के अनेक सिद्धान्त प्रचलित हैं। बुद्धि के इस समय प्रचलित सिद्धान्तों में से प्रमुख सिद्धान्तों को नीचे दिया गया है जो कि निम्नलिखित हैं–

  1. बुद्धि का एक-तत्त्व सिद्धान्त
  2. बुद्धि का द्वि-तत्त्व सिद्धान्त
  3. बुद्धि का बहु-तत्त्व सिद्धान्त
  4. बुद्धि का समूह-तत्त्व सिद्धान्त
  5. बुद्धि का प्रतिदर्श सिद्धान्त
  6. बुद्धि का क्रमिक महत्त्व सिद्धान्त
  7. बुद्धि का त्रि-आयाम सिद्धान्त

1. बुद्धि का एक-तत्त्व सिद्धान्त

बुद्धि के एक-तत्व सिद्धान्त को बिने ने दिया था। मनोवैज्ञानिक बिने ने बुद्धि को एक इकाई माना है, जिसके अनुसार व्यक्ति की विभिन्न मानसिक योग्यताएँ एक इकाई के रूप में काम करती हैं।

बीने के बुद्धि के एक तत्व सिद्धांत को मोनारिच सिद्धान्त भी कहते हैं। बुद्धि के मोनारिच सिद्धान्त के अनुसार बुद्धि केवल एक ही तत्त्व से बनती है और सभी क्षेत्रों में एक ही बुद्धि व्याप्त है। यह सिद्धान्त पूर्ण रूप से सही नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कोई व्यक्ति अगर विज्ञान में कुशल है तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह कला में भी कुशल होगा।

2. बुद्धि का द्वि-तत्व सिद्धान्त

बुद्धि के द्वि-तत्व सिद्धान्त को स्पीयरमैन ने दिया था। मनोवैज्ञानिक स्पीयरमैन के अनुसार बुद्धि दो तत्त्वों से मिलकर बनी होती है। बुद्धि के यह दो तत्व –
(1) सामान्य तत्त्व (2) विशिष्ट तत्त्व हैं।

बुद्धि के द्वि-तत्व सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में एक सामान्य तत्त्व होते हैं, जो विशिष्ट तत्त्वों से सम्बन्धित होते हैं। जिस व्यक्ति का सामान्य तत्त्व, विशिष्ट तत्त्व से जितना उत्तम रूप से सम्बन्धित होता है, उस व्यक्ति में उतनी ही अधिक बुद्धि होती है।

3. बुद्धि का बहु-तत्त्व सिद्धान्त

बुद्धि का बहु-तत्त्व सिद्धान्त का प्रतिपादन थॉर्नडाइक ने किया था। थॉर्नडाइक ने बुद्धि के द्वि-तत्व सिद्धान्त का खण्डन करते हुये कहा कि बुद्धि सिर्फ दो चींजों से मिलकर नहीं बनी, बल्कि बुद्धि की रचना बहुत से छोटे-छोटे तत्त्वों या कारकों के मिलने से हुई है।

थॉर्नडाइक के बुद्धि का बहु-तत्त्व सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक कारक या तत्त्व एक-दूसरे से स्वतन्त्र होता है, और एक विशिष्ट मानसिक क्षमता का प्रतिनिधित्व करता है।

थॉर्नडाइक आंकिक योग्यता, शाब्दिक योग्यता, दिशा-योग्यता, तर्क योग्यता, स्मरण शक्ति व भाषण योग्यता जैसे बुद्धि के कुछ मूल तत्व भी बताएं जो कि बुद्धि के सामान्य तत्व से भिन्न थे।

4. बुद्धि का समूह-तत्त्व सिद्धान्त

बुद्धि के समूह-तत्त्व सिद्धान्त को मनोवैज्ञानिक थर्स्टन ने दिया था। बुद्धि के इस समूह-तत्त्व सिद्धान्त को कारक विश्लेषण सिद्धांत भी कहते हैं।

थर्स्टन ने बुद्धि को प्राथमिक योग्यताओं के कई समूहों में विभाजित किया, जिनमें हर समूह की योग्यताओं में से से एक प्राथमिक तत्व होता है।

थर्स्टन ने बुद्धि के समूह-तत्त्व सिद्धान्त में बुद्धि के समूह-तत्त्व सिद्धान्त में कुल नौ तत्वों को बताया जो कि निम्नलिखित हैं–

  1. मौखिक तत्त्व या शाब्दिक तत्त्व
  2. प्रेक्षण तत्व
  3. अंक सम्बन्धी तत्त्व
  4. शाब्दिक-प्रवाह सम्बन्धी तत्त्व
  5. स्मृति शक्ति तत्त्व
  6. प्रत्यक्षीकरण सम्बन्धी तत्त्व
  7. तार्किक तत्त्व
  8. निगमन तर्क तत्त्व
  9. आगमन तर्क तत्त्व

थर्स्टन के बुद्धि के समूह-तत्त्व सिद्धान्त के अनुसार दो मूल तत्त्वों में जितना अधिक सह-सम्बन्ध होता है, उनके बीच उतना ही अधिक हस्तान्तरण भी होता है।

5. बुद्धि का प्रतिदर्श सिद्धान्त

बुद्धि का प्रतिदर्श सिद्धान्त को थॉमसन ने दिया था। थॉमसन के बुद्धि का प्रतिदर्श सिद्धान्त के अनुसार बुद्धि कई स्वतन्त्र तत्त्वों से मिलकर बनी होती है।

व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए अपनी सम्पूर्ण बुद्धि का प्रयोग न करके केवल उसके एक प्रतिदर्श का प्रयोग करता है।

थॉमसन के बुद्धि का प्रतिदर्श सिद्धान्त के अनुसार प्रतिदर्शों में जो सम्बन्ध होता है वह सभी योग्यताओं के स्वतन्त्र मिश्रण के कारण से आता है।

6. बुद्धि का क्रमिक महत्त्व सिद्धान्त

वर्नोन व बर्ट ने मिलकर बुद्धि का क्रमिक महत्त्व सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। बुद्धि के इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक मानसिक योग्यता को क्रमिक महत्त्व प्रदान किया गया है।

बुद्धि का क्रमिक महत्त्व सिद्धान्त

बुद्धि के इस सिद्धांत मे सबसे पहले क्रम में सामान्य मानसिक योग्यता आती है, और उसके बाद विशिष्ट योग्यता आती है।

7. बुद्धि का त्रि-आयाम सिद्धान्त

बुद्धि का त्रि-आयाम सिद्धान्त को 1967 में गिलफोर्ड ने दिया। गिलफोर्ड के इस बुद्धि का त्रि-आयाम सिद्धान्त को त्रिविमीय सिद्धान्त या बुद्धि संरचना सिद्धान्त भी कहते हैं।

गिलफोर्ड ने त्रिविमीय सिद्धान्त या बुद्धि संरचना सिद्धान्त, थॉर्नडाइक व स्पीयरमैन के सिद्धान्तों से अलग हटकर कारकों या तत्त्वों को तीन विमाओं में बाँटा है जो कि निम्लिखित है–

  1. संक्रिया
  2. विषयवस्तु
  3. उत्पादन
गिलफोर्ड बुद्धि का त्रि-आयाम सिद्धान्त

संक्रिया :-

यह व्यक्ति द्वारा की गई मानसिक प्रक्रिया के स्वरूप से सम्बन्धित होता है। संक्रिया को पाँच भागों में बाँटा गया है, जिनमें प्रत्येक के 5 कारक या तत्व हैं–

Sr. No.विमाकारक
(1)मूल्यांकन5
(2)अभिसारी चिन्तन5
(3)अपसारी चिन्तन5
(4)ज्ञान5
(5)स्मृति5

विषयवस्तु :-

विषयवस्तु में सूचनाओं के आधार पर संक्रियायें की जाती हैं। इन सूचनाओं को चार भागों में बाँटा गया है, जिनमें प्रत्येक के 4 कारक या तत्व हैं–

Sr. No.विमा
(1)आकार
(2)सांकेतिक
(3)शाब्दिक
(4)व्यावहारिक

उत्पादन -:

उत्पादन अर्थ किसी विशेष प्रकार की विषय-वस्तु द्वारा की गयी संक्रिया के परिणाम से होता है। गिलफोर्ड ने उत्पादन को छः भागों में बाँटा है, जो कि निम्नलिखित हैं, जिनमें प्रत्येक के 6 कारक या तत्व हैं–

Sr. No.विमा
(1)इकाई
(2)वर्ग
(3)सम्बन्ध
(4)पद्धतियाँ
(5)रूपान्तरण
(6)प्रयोग

इस प्रकार गिलफोर्ड के अनुसार बुद्धि के कुल = 5 x 4 x 6 = 120 कारक या तत्त्व होते हैं।

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