वंशानुक्रम और वातावरण का प्रभाव

वंशानुक्रम और वातावरण की बालक के विकास और पूरे जीवन में महत्वत्ता को देखते हुए अलग-अलग समय में अनेक मनोवैज्ञानिकों ने मानव जीवन में वंशानुक्रम के प्रभाव के संबंध में कई तरीकों के प्रयोग किये हैं।

विभिन्न प्रयोंगों के आधार पर हम यह कह सकते हैं, कि व्यक्ति के पूरे जीवनकाल में वंशानुक्रम और वातावरण का गहरा प्रभाव पड़ता है।

इससे पहले कि आप वंशानुक्रम और वातावरण का बालक जीवन में प्रभाव को पढ़ें, यदि आप वंशानुक्रम का अर्थ और परिभाषा नहीं जानते हैं तो पढ़ लें हमने अपनी पिछली पोस्ट में वातावरण का अर्थ और परिभाषा को भी बताया है।

और साथ ही साथ आप वंशानुक्रम के सिद्धांत या नियमों को भी समझ लें, जिससे आपको को वंशानुक्रम के जीवन में प्रभाव को समझने में आसानी होगी।

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बालक के विकास में वंशानुक्रम का प्रभाव :-

यहाँ हम आपको बालक के जीवन में वंशानुक्रम के प्रभावों में से कुछ प्रमुख प्रभावों के बारे में बताएँगे जो कि निम्नलिखित हैं–

  1. वंशानुक्रम का मूल शक्तियों पर प्रभाव
  2. वंशानुक्रम का शारीरिक लक्षणों पर प्रभाव
  3. वंशानुक्रम का प्रजाति की श्रेष्ठता पर प्रभाव
  4. वंशानुक्रम का व्यावसायिक योग्यता पर प्रभाव
  5. वंशानुक्रम का सामाजिक स्थिति पर प्रभाव
  6. वंशानुक्रम का चरित्र पर प्रभाव
  7. वंशानुक्रम का महानता पर प्रभाव
  8. वंशानुक्रम का वृद्धि पर प्रभाव

वातावरण का प्रभाव :-

मनोवैज्ञानिकों द्वारा किये गए अध्ययन के आधार पर यह साबित होता है, कि बालक के व्यक्तित्व पर भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण का महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यहाँ वातावरण का व्यक्ति के जीवन में पड़ने वाले प्रमुख प्रभावों को बताया गया है, जो कि निम्नलिखित हैं–

  1. वातावरण का शारीरिक अन्तर पर प्रभाव
  2. वातावरण का मानसिक विकास पर प्रभाव
  3. वातावरण का बुद्धि पर प्रभाव
  4. वातावरण का व्यक्तित्व पर प्रभाव
  5. वातावरण का प्रजाति की श्रेष्ठता पर प्रभाव
  6. वातावरण का अनाथ बच्चों पर प्रभाव
  7. वातावरण का जुड़वाँ बच्चों पर प्रभाव
  8. वातावरण का बालक पर बहुमुखी प्रभाव

1. वंशानुक्रम का मूल शक्तियों पर प्रभाव :-

थॉर्नडाइक ने बालक के जीवन और विकास में बालक की मूल शक्तियों में वंशानुक्रम के प्रभाव को वरीयता दी है। थॉर्नडाइक का मानना है कि बालक की मूल शक्तियों का मुख्य कारण उसका वंशानुक्रम है।

2. वंशानुक्रम का शारीरिक लक्षणों पर प्रभाव :-

वंशानुक्रम का प्रभाव मानव के शारिरिक लक्षणों में भी पड़ता है। कार्ल पीयरसन वंशानुक्रम के शारिरिक लक्षणों के प्रभावों के संबंध में अपना मत दिया है कि यदि ” माता-पिता की लम्बाई का असर उनकी संतानों में भी पड़ता है, जो कि एक प्रकार का शारिरिक लक्षण है।

3. वंशानुक्रम का प्रजाति की श्रेष्ठता पर प्रभाव :-

वंशानुक्रम का प्रजातियों की श्रेष्ठता में गहरा प्रभाव पड़ता है, इसके संबंध में क्लिनबर्ग ने अपने विचार देते हुए कहा है कि “बुद्धि की श्रेष्ठता का कारण प्रजाति है। यही कारण है कि अमरीका की श्वेत प्रजाति, नीग्रो प्रजाति से श्रेष्ठ है।” हैनलकक हांलाकि क्लिनबर्ग के इस विचार में बहुत से मनोवैज्ञानिकों में मतभेद भी रहा है।

4. वंशानुक्रम का व्यावसायिक योग्यता पर प्रभाव :-

कैटल ने व्यावसायिक योग्यता का मुख्य कारण वंशानुक्रम को ही मानते हैं। कैटल ने व्यावसायिक में वंशानुक्रम का प्रभाव का पता करने के लिए अमेरिका के 885 वैज्ञानिकों के परिवारों का की योग्यता का अध्ययन किया और बताया कि कुल 885 वैज्ञानिक परिवारों में से व्यवसायी वर्ग से संबंध रखने वाले परिवारों की संख्या कुल संख्या का 2/5 थी, इसी प्रकार उत्पादक वर्ग के 1/2 और कृषि वर्ग के केवल 1/4 परिवार थे।

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5. वंशानुक्रम का सामाजिक स्थिति पर प्रभाव :-

विनशिप ने वंशानुक्रम का सामाजिक स्थिति पर प्रभाव के संबंध में अपने विचार देते हुए कहा है, कि गुणवान और प्रतिष्ठित माता-पिता की सन्तान भी अपने जीवनकाल में प्रतिष्ठा प्राप्त करती है।

विनशिप ने वंशानुक्रम के सामाजिक स्थिति पर प्रभाव में अपना मत देने से पहले उन्होंने एडवर्ड और उनकी पत्नी एलिजाबेथ के परिवार का अध्ययन किया जो कि (एडवर्ड और एलिजाबेथ) एक प्रतिष्ठित परिवार से संबंध रखते थे। जिनके वंशजों ने प्रतिष्ठित पदों पर कार्य किया और उनके वंशजों में से एक अमेरिका का उपराष्ट्रपति भी बना।

6. वंशानुक्रम का चरित्र पर प्रभाव :-

डगडेल का वंशानुक्रम का चरित्र पर प्रभाव पर मानना है कि चरित्रहीन माता-पिता की सन्तान चरित्रहीन होती है। और इसी प्रकार अच्छे चरित्र वाले माता पिता की संतानें भी अच्छी चरित्र वाली होती हैं।

डगडेल ने वंशानुक्रम का चरित्र पर प्रभाव पर अपना विचार सन 1877 ई. में ज्यूकस के वंशजों का अध्ययन करके दिया था।

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7. वंशानुक्रम का महानता पर प्रभाव :-

गाल्टन का वंशानुक्रम का महानता पर प्रभाव के बारे में सीधा मत है, कि व्यक्ति की महानता का कारण उसका वंशानुक्रम है।

व्यक्ति का कद, वर्ण, स्वास्थ्य, बुद्धि, मानसिक शक्ति आदि उसके वंशानुक्रम पर आधारित होते हैं। वंशानुक्रम का महानता पर प्रभाव में गॉल्टन कहते हैं कि–

महान न्यायाधीशों, राजनीतिज्ञों, सैनिक पदाधिकारियों, साहित्यकारों, वैज्ञानिकों और खिलाड़ियों के जीवन चरित्रों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है, कि इनके परिवारों में इन्हीं क्षेत्रों में महान कार्य करने वाले अन्य व्यक्ति भी हुए हैं।
– गाल्टन
(वंशानुक्रम का महानता पर प्रभाव)

8. वंशानुक्रम का वृद्धि पर प्रभाव :-

गोडार्ड ने वंशानुक्रम का वृद्धि पर प्रभाव पर कहा है, कि मन्द बुद्धि माता-पिता की सन्तान मन्द बुद्धि और तेज बुद्धि के माता-पिता की सन्तान तीव्र बुद्धि वाली होती है।

वंशानुक्रम के वृद्धि पर प्रभाव पर कोलेसनिक ने कहा है कि–

जिस सीमा तक व्यक्ति की शारीरिक रचना को उसके पित्रैक निश्चित करते हैं, उस सीमा तक उसके मस्तिष्क एवं स्नायु संस्थान की रचना, उसके अन्य लक्षण, उसकी खेल-कूद सम्बन्धी कुशलता और उसकी गणित सम्बन्धी योग्यता ये सभी बातें उसके वंशानुक्रम पर निर्भर होती हैं, पर वे बातें उसके वातावरण पर कहीं अधिक निर्भर होती है।
– कोलेसनिक
(वंशानुक्रम का वृद्धि पर प्रभाव)

उपरोक्त कथनों से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि व्यक्ति के शारीरिक तथा मानसिक विकास पर वंशानुक्रम का प्रभाव पड़ता है।


बालक पर वातावरण का प्रभाव :-

मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्ति के विकास और जीवन पर पड़ने वाले वातावरण के प्रभाव के अनेकों अध्ययन करके साबित किया है, कि व्यक्ति के जीवन में वातावरण का प्रभाव बहुत अहम भूमिका निभाता है।

1. वातावरण का शारीरिक अन्तर पर प्रभाव :-

वातावरण का शारीरिक अन्तर पर प्रभाव के संबंध में फ्रेन्ज बोन्स का मत है कि–

विभिन्न प्रजातियों के शारीरिक अन्तर का कारण वंशानुक्रम न होकर वातावरण है।
– फ्रेन्ज बोन्स

फ्रेन्ज बोन्स ने अपने वातावरण का शारीरिक अन्तर पर प्रभाव पर दिए गए विचार को साबित करने के लिए अनेक उदाहरण दिए हैं कैसे कि फ्रेन्ज बोन्स ने कहा कि जो जापानी और यहूदी लोग अमेरिका में अनेक पीढ़ियों से निवास कर रहे हैं, उनकी लम्बाई अमेरिका के भौगोलिक वातावरण के कारण बढ़ गयी।

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2. वातावरण का मानसिक विकास पर प्रभाव :-

वातावरण का मानसिक विकास पर पड़ने वाले प्रभाव के लिए गोर्डन का मानना है कि व्यक्ति को अपने चारों ओर उचित सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण न मिलने पर मानसिक उसकी विकास की गति धीमी हो जाती है।

गोर्डन ने अपने मत को लेकर नदियों के किनारे रहने वाले बच्चों का उदाहरण दिया और अध्ययन करके सिद्ध किया की इन बच्चों का वातावरण अच्छा न होने के कारण इनके विकास की गति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा था।

3. वातावरण का बुद्धि पर प्रभाव :-

वातावरण का बुद्धि पर प्रभाव पर केंडोल ने अध्ययन करके बताया कि –

बुद्धि के विकास पर वातावरण का प्रभाव, बुद्धि के विकास पर पड़ने वाले वंशानुक्रम के प्रभाव की अपेक्षा अधिक होता है।
– केंडोल

केंडोल ने बुद्धि पर वातावरण के प्रभाव के बारे में जानने के लिए फ्रांस के 552 विद्वानों का अध्ययन करके पता लगाया कि उनमें से अधिकांश धनी वर्ग से सम्बन्धित थे। जिससे उनको शिक्षा ग्रहण करने की उपयुक्त सुविधाएँ उपलब्ध हुईं।

स्टीफैंस ने केंडोल का समर्थन किया और कहा की–

यदि बच्चों को अच्छे वातावरण में पाला जाये, तो उनकी बुद्धि-लब्धि में वृद्धि होती है।
– स्टीफैंस

4. वातावरण का व्यक्तित्व पर प्रभाव :-

वातावरण का व्यक्तित्व पर प्रभाव के सम्बंध में कूले 71 साहित्यकारों का अध्ययन करके पता लगाया कि उनमें से दो साहित्यकार निर्धन परिवारों के थे, किन्तु उत्तम वातावरण मिलने के कारण वे दोनों भी महान साहित्यकार बन सके।

उत्तम वातावरण में पलने पर बच्चों का व्यक्तित्व का विकास बहमुखी होता है। यदि निर्धन माता-पिता के बालक को अच्छे वातावरण में पाला जाये, तो वह भी अच्छे व्यक्तित्व का निर्माण कर सकता है।

5. वातावरण का प्रजाति की श्रेष्ठता पर प्रभाव :-

वातावरण का प्रजाति की श्रेष्ठता पर प्रभाव के संबंध में क्लार्क ने अपना मत देते हुये कहा है कि–

कुछ प्रजातियों की बौद्धिक श्रेष्ठता का कारण वंशानुक्रम न होकर वातावरण है।
– क्लार्क

क्लार्क ने वातावरण का प्रजाति की श्रेष्ठता पर प्रभाव में अपने विचार अमरीका के कुछ गोरे और नीग्रो लोगों की बुद्धि परीक्षा लेकर सिद्ध किया क्लार्क का कहना है कि, नीग्रो प्रजाति की बुद्धि का स्तर इसलिए निम्न है, क्योंकि उनको अमेरिका की श्वेत प्रजाति के समान शैक्षिक, सांस्कृतिक और सामाजिक वातावरण उपलब्ध नहीं होता है।

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6. वातावरण का अनाथ बच्चों पर प्रभाव :-

समाज कल्याण केन्द्रों में अनाथ और बेसहारा बच्चे आते है। वे साधारणतः निम्न परिवारों से संबंध रखते हैं, लेकिन समाज कल्याण केन्द्रों में उनका अच्छा पालन-पोषण होता है, और उनको एक बेहतर वातावरण भी मिलता है, जिससे उनको अच्छा व्यक्तित्व प्राप्त होता है।

इस प्रकार के वातावरण में पाले जाने वाले बच्चे समग्र रूप में अपने माता-पिता से अच्छे ही सिद्ध होते हैं।
– वुडवर्थ

7. वातावरण का जुड़वाँ बच्चों पर प्रभाव :-

जुड़वाँ बच्चों के शारीरिक लक्षणों, मानसिक शक्तियों, व्यवहार और शैक्षिक योग्यताओं में, अत्यधिक समानता होती है। लेकिन यदि दोनों बच्चों को अलग-अलग वातावरण में रखा जाए तो उनमें पर्याप्त अन्तर होता है।

न्यूमैन, फ्रीमैन और होलजिंगर ने 20 जोड़े जुड़वाँ बच्चों में प्रत्येक जोड़े के एक बच्चे को गाँव के फार्म पर और दूसरे को नगर में रखा। बड़े होने पर दोनों बच्चों में पर्याप्त अन्तर पाया गया।

पर्यावरण का बुद्धि पर साधारण और उपलब्धि पर अधिक व विशेष प्रभाव पड़ता है।
– स्टीफेन्स

8. वातावरण का बालक पर बहुमुखी प्रभाव :-

वातावरण, मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक सहित सभी गुणों पर गहरा प्रभाव डालता है। इसकी पुष्टि एवेरॉन के जंगली बालक के उदाहरण से की–

एक बच्चे को जन्म के बाद ही भेड़िया उठा ले गया था और उसका पालन-पोषण जंगली पशुओं के बीच में हुआ था। कुछ शिकारियों ने उसे सन 1799 ई. में पकड़ लिया। उस समय उसकी आयु 11 या 12 वर्ष की थी। वह बच्चा पशुओं के समान हाथों-पैरों से चलता था। वह कच्चा मांस खाता था। उसमें मनुष्य के समान बोलने और विचार करने की शक्ति नहीं थी। उसको मनुष्य के समान सभ्य और शिक्षित बनाने के सब प्रयास विफल हुए।

वातावरण के मानव जीवन में पड़ने वाले प्रभावों के विषय में हुए स्टीफेन्स ने लिखा है–

बच्चा जितने अधिक समय उत्तम वातावरण में रहता है, उसका व्यक्तित्व उतना ही उत्तम होगा। हालांकि मनुष्य के व्यक्तित्व और वृद्धि में कुछ प्रभाव आनुवंशिकता भी होता है।
– स्टीफेन्स
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